बचपन मे सिनेमा देखने जाते थे तो " दी एंड " के बाद पर्दे पर तिरन्गा लहराता था और जन गण मन--------
आइए इसे कई जायको मे सुने.
Saturday, February 6, 2010
Friday, February 5, 2010
मैंने लाखो के बोल सहे --सितमगर तेरे लिए
निर्मला देवी की खनकती आवाज में जो जादू है उसे तो सुनकर ही जाना जा सकता है |
कल आपके सामने अंतिम पेशकश करूँगा |कल ही सुनलेना |
कल आपके सामने अंतिम पेशकश करूँगा |कल ही सुनलेना |
आज उस्तादों की बारी है
बाबुल मेरा नैहर छूटा ही जाये ........इसे आप पंडित भीमसेन जोशी की आवाज में सुनिए ,कुछ नया ही मिलेगा | झनक झनक पायल बाजे ---- उस्ताद आमिर अली खान साहेब की आवाज में | रचनाये बड़ी है ,फुर्सत से सुनिए |
Thursday, February 4, 2010
माँ के मन की वेदना
प्रस्तुत पंक्तियाँ मराठी में है | मेरी बड़ी बहन ने इन्हें लिखा है |उसने यह कल्पना की है की आज मेरी ८३ साल की माँ अकेलेपन में क्या सोचती होगी |बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है ,मेरी मराठी भाषा की पकड़ जरा कमजोर है पर बावजूद इसके मेरे मन ने कहा " वाह!"
असं का वाटतं?
किलकिलत्या डोळ्यांची, इवल्या इवल्या पावलांची
कालच जन्मलेली ही बाळं, पाहता पाहता मोठी झालीत
त्यांना बोट धरून चालायला शिकवता शिकवता
तीच माझी काठी झालीत, आयुष्याच्या सायंकाळी प्रकाशाची ज्योत झालीत.
मी विचार करते कि परवा परवाच तर ही चिमुरडी जरा जराश्यात रडायची,
तिच्या आसवांची गंगा यमुना काठोकाठ भरायची
कसं होणार हिचं? मला सारखी काळजी असायची
संसाराच्या गंगेत हिची नाव कशी काय टिकायची?
आणी हा! गोंडस छोटा, लाल गुबगुबीत गालांचा
बालविहारात खेळताना पडला, खरचटला तर,
"अहो तुमचे टोमाटो आज फुटलेत " असा
टोकेकर बाईंचा लगेच निरोप यायचा.
खेळकर, पण हट्टी होता, भर बाजारात लोळायचा
तरी आपल्या विविध खोड्यांनी सर्वांना मोहायचा.
पशु प्राणी इतके प्रिय कि, रस्त्यावरच्या कुत्र्याला उचलून आणून
त्याला दूध मिळे पर्यंत हा नाही जेवायचा
मोठा झाला, समंजस झाला, सेवेच्या व्यवसायात शिरला.
सह्चरणी सव बरोबरीनी जनसेवेच्या कार्यात गुंतला.
वडीलधार्यांना मान देत दोघांनी सांभाळला व्यवसाय
जगाचं त्यांच्यावर प्रेम पाहता मी म्हणावे काय
ती मात्र दूर दूर गेली, तुरळक झाल्यात भेटी
माझ्या मनी तिच्या जीवनाची चित्र नेहमी रंगती
प्रेमळ आणी धैर्यवान साथी तिला होता, तरी
कशी असेल, काय करत असेल हा प्रश्न मनी होता
हा जवळ आहे, रोज डोळ्यांना दिसतो
तरी वाटतं माझ्यापासून खूप दूर असतो
मग ती जेंव्हा येते, हे सहजच आहे समजावते,
तेंव्हा तीच माझी आई व मी तिची लेक होते.
ती आल्यावर होणारा आनंद वेगळाच असतो
कारण माझ्या बोलण्याला तिचे कान व माझ्या कानाला तिचा स्वर मिळतो
सर्व सुखी आहेत, मी विरक्त व्हायाला हवं हे जरी मला समजतं, तरी
ह्या दोघांनी एकदा माझ्या कुशीत झोपावं असं का मला वाटतं?
असं का वाटतं?
किलकिलत्या डोळ्यांची, इवल्या इवल्या पावलांची
कालच जन्मलेली ही बाळं, पाहता पाहता मोठी झालीत
त्यांना बोट धरून चालायला शिकवता शिकवता
तीच माझी काठी झालीत, आयुष्याच्या सायंकाळी प्रकाशाची ज्योत झालीत.
मी विचार करते कि परवा परवाच तर ही चिमुरडी जरा जराश्यात रडायची,
तिच्या आसवांची गंगा यमुना काठोकाठ भरायची
कसं होणार हिचं? मला सारखी काळजी असायची
संसाराच्या गंगेत हिची नाव कशी काय टिकायची?
आणी हा! गोंडस छोटा, लाल गुबगुबीत गालांचा
बालविहारात खेळताना पडला, खरचटला तर,
"अहो तुमचे टोमाटो आज फुटलेत " असा
टोकेकर बाईंचा लगेच निरोप यायचा.
खेळकर, पण हट्टी होता, भर बाजारात लोळायचा
तरी आपल्या विविध खोड्यांनी सर्वांना मोहायचा.
पशु प्राणी इतके प्रिय कि, रस्त्यावरच्या कुत्र्याला उचलून आणून
त्याला दूध मिळे पर्यंत हा नाही जेवायचा
मोठा झाला, समंजस झाला, सेवेच्या व्यवसायात शिरला.
सह्चरणी सव बरोबरीनी जनसेवेच्या कार्यात गुंतला.
वडीलधार्यांना मान देत दोघांनी सांभाळला व्यवसाय
जगाचं त्यांच्यावर प्रेम पाहता मी म्हणावे काय
ती मात्र दूर दूर गेली, तुरळक झाल्यात भेटी
माझ्या मनी तिच्या जीवनाची चित्र नेहमी रंगती
प्रेमळ आणी धैर्यवान साथी तिला होता, तरी
कशी असेल, काय करत असेल हा प्रश्न मनी होता
हा जवळ आहे, रोज डोळ्यांना दिसतो
तरी वाटतं माझ्यापासून खूप दूर असतो
मग ती जेंव्हा येते, हे सहजच आहे समजावते,
तेंव्हा तीच माझी आई व मी तिची लेक होते.
ती आल्यावर होणारा आनंद वेगळाच असतो
कारण माझ्या बोलण्याला तिचे कान व माझ्या कानाला तिचा स्वर मिळतो
सर्व सुखी आहेत, मी विरक्त व्हायाला हवं हे जरी मला समजतं, तरी
ह्या दोघांनी एकदा माझ्या कुशीत झोपावं असं का मला वाटतं?
आबिदा -----मन लागो यार फकीरी में
यह सप्ताह संगीत को ही समर्पित किया जाये तो क्या बुराई? आबिदा याने आवाज और भाव मन को गहरे तक झकझोर देने वाली शख्सियत | आप भी डूबिये , उताराइये इस में और कीजिये रसास्वादन मन भर के |
Tuesday, February 2, 2010
आज जीतेन्द्र अभिषेकी को सुनिए
कई दिनों से सोच रहा था की कैसे अपने ब्लॉग पर संगीत का समावेश करूँ? कंप्यूटर के अन्दर क्या हो रहा है और उसको कैसे अपने मतलब के लिए उमेठा जाय इसकी मुझे ज्यादा समझ नहीं है| आम खाओ और पेड मत गिनो वाली तर्ज पर जो पका पकाया मिला उसके मजे लेलो क फ़लसफ़ा क्या बुरा है? फ़िर भी कुछ तो करना ही था सो ढूंढ्ने से लग गया और फ़ाइल फ़ेक्ट्री के सहारे कुछ मुझे आल्हादित करने वाला संगीत बांट्ने का प्रयास।
कल कुमार गंधर्व जी का कबीर के" निर्गुन के गुन " और आज जितेन्द्र अभिशेकी जी कि रचना "ईतना तो करना स्वामी"
कल कुमार गंधर्व जी का कबीर के" निर्गुन के गुन " और आज जितेन्द्र अभिशेकी जी कि रचना "ईतना तो करना स्वामी"
Sunday, January 24, 2010
एक नया राष्ट्रीय खेल ; नयी सम्भावनाये
मेरी धर्मपत्नी को क्रिकेट का क और टेनिस का ट समझ मे नही आता।पर आपको यह जानकर आनन्द होगा कि पिछले तीन माह मे उसने वीनस विलियम के बल्ले से सचिन तेन्दुलकर के सारे रिकोर्ड तोड डालें हैं।
इस नये खेल का नाम है "क्रिटेन"।
मेरी पत्नी का बल्ला यह है------------
इस नये खेल का नाम है "क्रिटेन"।
मेरी पत्नी का बल्ला यह है------------
इस खेल मे हमारे देश और देशवासियों के लिये अपार सम्भावनायें हैं।
Friday, January 22, 2010
Tuesday, January 12, 2010
Hardanhalli
"Swear words in some foreign language are easier to utter and are even tolerated by society."
ऊंचे पायदान पर विराजने का दुःख
जब मै छोटा था तब इब्ने सफी और प्रेम प्रकाश को बड़े चाव से पढ़ता था | कर्नल विनोद ,केप्टन हामिद ,विजय इत्यादि मेरे चहेते हीरो थे |उनकी जासूसी दुनिया और उनके कारनामे बड़े ही अच्छे और रोचक लगते थे |पर दिमाग के एक कोने में कभी कभी ये ख्याल भी झांकता रहता था की ये महापुरुष दिन रात ख़ूनी का या देश के दुश्मनों का पीछा करते रहते है ,कई बार तो बड़ी अड़ी तड़ी वाली स्थिति भी होती है और अगर ऐसे में इन्हें नित्यकर्मो से निपटने की आवश्यकता आन पड़े तो ये कैसा करते होंगे ? किताबें पढने का मेरा शौक बदस्तूर जरी रहा ,उपन्यास ,कहानियां ,महापुरुषों की जीवनिया ,जितनी मिली सभी तो पढ़ डाली पर मेरी जिज्ञासा का समाधान नहीं हुआ आज तक |
हमने बड़े आदमी को काफी बड़ा बना कर रखा हुआ है | हमारे मन में यह विचार कभी आता ही नहीं की वो भी एक सामान्य आदमी है और उसका जीवन भी उन्ही सामान्य क्रियाओं से संचालित होता है जिस से की आपका और हमारा |हम ऐसा क्यों समझते हैं की फलां व्यक्ति डॉक्टर है तो बीमार नहीं पड़ सकता ,पुलिस का बड़ा अधिकारी है तो चोर नहीं हो सकता ,मंत्री है तो भ्रष्ट नहीं हो सकता | बड़ा होना क्या आदमी होने से नकारने जैसा है? क्या नारायण दत्त तिवारी आदमी नहीं है? वैसे ही देवेगौडा भी तो आखिर एक इंसान ही है |क्या उसे गुस्सा नहीं आ सकता ? और अगर उसने एक आम आदमी की तरह गुस्से में गाली दे भी दी तो इतना बवाल क्यों .........
( सभ्य असभ्य का भेद मत समझाइये, ये चर्चा बड़े और आम आदमी की चर्चा है | यह कतई जरूरी नहीं की जो बड़ा है वो सभ्य ही होगा )
Thursday, January 7, 2010
ये तो सरासर ................है !
शीर्षक में जो खाली स्थान है उसे आप अपनी मर्जी से जैसा चांहे वैसा भरले |
आज दोपहर को शासन की तरफ से एक पत्र आया |PNDT CELL (प्रसव पूर्व गर्भ निर्धारण एवं निदान अधिनियम ) जिसका की अध्यक्ष जिले का कलेक्टर और सचिव मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी होता है उनकी तरफ से यह पत्र आया था |पत्र में यह फरमान था की जितने भी चिकित्सक सोनोग्राफी के लिए पंजीकृत हैं उन्हें एक पोस्टर अपने अस्पताल में किसी प्रमुख स्थान पर लगाना आवश्यक है | हम सभी सोनोग्राफर इस अधिनियम से बंधे हुए हैं और इसके दिशा निर्देशों का अक्षरश पालन करते हीं हैं | इस नए आदेश को न मानने का सवाल ही नहीं उठता था | किन्तु पोस्टर देखने के बाद मन क्षोभ एवं गुस्से से भर गया | क्या शासन एवं उसके कारिंदे इतने संवेदनहीन हो गए हैं या जान बूझ कर ऐसा कर रहे हैं ? " मशीन खरीदी है तो खर्च निकालना ही होगा " ये पढने के बाद हंसू की रोऊ समझ नहीं पा रहा था | पहले विचार आया था की इस बारे में जिलाधीश के समक्ष अपनी आपत्ति प्रस्तुत करना चाहिए | फिर ख्याल आया की जिसने अपराध किया उसीको जज कैसे बनाऊं ? जिलाधीश द्वारा भेजे गए इस पोस्टर को देख कर मै तो किंकर्तव्यमूढ़ रह गया |
Wednesday, January 6, 2010
रिश्ते
रिश्ते सिरहाने की तरह होते हैं | जब आप थक जातें हैं तो उनके सहारे सो जातें हैं |उदास होतें हैं तो उन पर सर रखकर आंसू बहा देते हैं |खुश होने पर गले लगाकर झूम सकतें हैं | वैसे सपनो में तो वे आपके साथ ही होतें हैं |
ये मेरा नहीं है | कंही से बस यूंही मिल गया |
ये मेरा नहीं है | कंही से बस यूंही मिल गया |
Friday, January 1, 2010
हकीकत
वर्ष बदलने से अब हर्ष नहीं होता
उत्साह उमंग का स्पर्श नहीं होता |
चाह थी कभी दुनिया बदलने की
पर मुझसे अब संघर्ष नहीं होता ||
उत्साह उमंग का स्पर्श नहीं होता |
चाह थी कभी दुनिया बदलने की
पर मुझसे अब संघर्ष नहीं होता ||
Tuesday, December 22, 2009
समझदारी
कंही पढ़ा था की देश के और देश की समस्याओं के बारे में चर्चा करना है तो चिल्ला चिल्ला कर करो पर अगर अपने शहर के बारे में बात कर रहे हो तो दबी जुबान से बात करना सेहत के लिए फायदेमंद होता है |
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